Home Bihar Exclusive: पीएम मोदी के खिलाफ मोर्चाबंदी में जुटे नीतीश की पार्टी क्या टूट जाएगी? दिल्ली वाली मीटिंग के बाद चर्चा तेज

Exclusive: पीएम मोदी के खिलाफ मोर्चाबंदी में जुटे नीतीश की पार्टी क्या टूट जाएगी? दिल्ली वाली मीटिंग के बाद चर्चा तेज

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Exclusive: पीएम मोदी के खिलाफ मोर्चाबंदी में जुटे नीतीश की पार्टी क्या टूट जाएगी? दिल्ली वाली मीटिंग के बाद चर्चा तेज

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पटना: नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के लिए अगले साल होने लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) किसी एसिड टेस्ट से कम नहीं रहने वाला है। इसलिए कि बीजेपी जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के साथ अब जेडीयू नहीं है। बीजेपी की जगह अब आरजेडी नीतीश कुमार के साथ है। केंद्र में नरेंद्र मोदी का चेहरा देख कर बीजेपी के समर्थकों ने पिछली बार (लोकसभा चुनाव 2019) नीतीश की पार्टी जेडीयू को खुले मन से समर्थन दिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने बूते 38 सीटों पर चुनाव लड़ कर नीतीश अपनी ताकत आजमा चुके हैं। उन्हें मात्र दो सीटों से संतोष करना पड़ा था, जबकि 2019 में बीजेपी के साथ रहने पर जेडीयू को 16 सीटों पर जीत मिली थी।

आरजेडी समर्थकों से नीतीश को मदद मिलना संदिग्ध

नीतीश कुमार आरजेडी के साथ हैं, लेकिन आरजेडी समर्थक उन्हें बीजेपी समर्थकों की तरह खुले मन से साथ देंगे, इस पर संदेह है। संदेह का कारण यह है कि आरजेडी के वोटर हमेशा नीतीश का विरोध करते रहे हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो नीतीश कुमार भी आरजेडी के मुखर आलोचक रहे हैं। नीतीश कुमार के समर्थक वही थे, जिन्होंने आरजेडी के शासन से ऊब कर विकल्प के रूप में जेडीयू या उसके पूर्व समता पार्टी को देखा था। आरजेडी के साथ नीतीश के जाने पर वैसे वोटर खफा हैं। इस बीच नीतीश के कारण उनके लव-कुश समीकरण वाले दो नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा ‘कुश’ को लेकर किनारे हो गए हैं तो ‘लव’ में आरसीपी सिंह ने सेंधमारी कर दी है। यानी नीतीश का आधार वोट भी हाथ से गया और आरजेडी समर्थक भी उनका साथ नहीं दे रहे।

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आरजेडी से नीतीश के खिलाफ उठती रही है आवाज

आरजेडी के विधायक सुधाकर सिंह को तो नीतीश कुमार फूटी आंख नहीं सुहाते हैं। वे न सिर्फ उनके खिलाफ निजी हमले करते रहे हैं, बल्कि सरकार की आलोचना से भी बाज नहीं आते। नीतीश कुमार की नाराजगी के बावजूद आरजेडी ने अभी तक सुधाकर सिंह के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो इसका संकेत उन्हें समझ जाना चाहिए। आरजेडी के नेता-विधायक अगर बार-बार तेजस्वी की ताजपोशी की तारीख बताते रहे हैं तो इससे उनकी मंशा का पता चलता है। वे नहीं चाहते कि नीतीश कुमार अब और कुर्सी पर रहें। नीतीश पर चप्पल फेंकने, घूसा मारने और कुर्सी फेंकने जैसी घटनाएं भी साबित करती हैं कि बिहार के लोग उनसे अब खासा खफा हैं। इसी साल 25 फरवरी को पूर्णिया में हुई महागठबंधन की रैली में शिक्षक अभ्यर्थियों ने नीतीश कुमार के भाषण के दौरान नारेबाजी की, लेकिन तेजस्वी के भाषण के वक्त सन्नाटा रहा। यानी आरजेडी के साथ आने पर नीतीश को बीजेपी की तरह समर्थन की गुंजाइश कम ही दिखती है।

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जेडीयू के कई सांसद छोड़ सकते हैं नीतीश का साथ

आरएलजेडी के उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि जेडीयू के सांसद उनके और बीजेपी के संपर्क में हैं। उनके इस दावे को अगर इस नजरिए से देखा जाए कि उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू छोड़ दिया है, इसलिए ऐसा बोल रहे हैं तो यह उचित नहीं होगा। सच्चाई यह है कि जेडीयू के सांसद यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर बीजेपी समर्थकों का साथ नहीं मिलता तो उनकी जीत संदिग्ध थी। इसलिए यह मान कर चलना चाहिए कि उपेंद्र कुशवाहा गलत नहीं बोल रहे। उनके दावे में अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

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उपेंद्र और आरसीपी को सांसदों को तोड़ने का टास्क

बीजेपी ने अपने सभी सहयोगियों को अलग-अलग टास्क दिया है। उपेंद्र कुशवाहा और आरसीपी सिंह को जेडीयू सांसदों को तोड़ने का टास्क मिला है। चूंकि आरसीपी सिंह 2019 में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, इसलिए टिकट बंटवारे में उनकी बड़ी भूमिका थी। जिनको उन्होंने टिकट दिया, वे जाहिरा तौर पर उनके संपर्क में होंगे। उपेंद्र कुशवाहा भी लगातार तीन साल जेडीयू संसदीय बोर्ड के चेयरमैन रहे हैं, इसलिए पार्टी में उनके भी सांसदों से अच्छे ताल्लुकात हैं। अपने संबंधों-संपर्कों का इस्तेमाल कर दोनों जेडीयू सांसदों को तोड़ेंगे। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलजेडी के राष्ट्रीय महासचिव फजल इमाम मल्लिक कहते हैं कि जेडीयू इस बार अच्छे उम्मीदवारों के लिए तरस जाएगा। सभी सिटिंग सांसद जेडीयू की डूबती नाव की सवारी छोड़ भागेंगे।
रिपोर्ट- ओमप्रकाश अश्क

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