Home Bihar मां-पिता छोड़ चुके थे उम्मीद, डॉक्टरों ने भी मान ली थी हार, फिर बिहार के बेगूसराय में हुआ ऐसा चमत्कार कि…

मां-पिता छोड़ चुके थे उम्मीद, डॉक्टरों ने भी मान ली थी हार, फिर बिहार के बेगूसराय में हुआ ऐसा चमत्कार कि…

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मां-पिता छोड़ चुके थे उम्मीद, डॉक्टरों ने भी मान ली थी हार, फिर बिहार के बेगूसराय में हुआ ऐसा चमत्कार कि…

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हाइलाइट्स

डॉक्टर ने 500 ग्राम के दो जुड़वा बच्चों को नई जिंदगी देने का काम किया.
मेडिकल साइंस में ढाई से तीन किलो के बच्चे को नार्मल कैटेगरी में रखा जाता है
वजन एक किलो से कम हो तो इसे मेडिकल भाषा में एक्सट्रीमली लो वेट कैटेगरी में रखा जाता है.

बेगूसराय. चमत्कार (Miracle In Begusarai) किसी के भी जीवन में हो सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है लोग लगातार प्रयास करते हुये लक्ष्य की ओर हमेशा बढ़ते रहे. ऐसे ही प्रयास का परिणाम है कि बेगूसराय (Begusarai) में एक ऐसा चमत्कार देखने को मिला जब एक डॉक्टर ने 500 ग्राम के दो जुड़वा बच्चों (Twins) को नई जिंदगी देने का काम किया. ऐसा चमत्कार तब सामने आया जब बच्चे को जन्म देने वाले मां-पिता भी सारी उम्मीद छोड़ चुके थे. लेकिन, डॉक्टर ने अपनी जिद को चमत्कार मे बदल दिया. बता दें, आम तौर पर 500 ग्राम से कम वजन के बच्चे को बचाना काफी मुश्किल होता है. इसे आम लोग ही नहीं डॉक्टर भी मानते है. लेकिन, डॉ अरविंद कुमार (डॉ अरविंद कुमार) के सफल उपचार को न सिर्फ बच्चे का परिवार बल्कि आम लोग भी अब इसे चमत्कार मान रहे है.

दरअसल मेडिकल साइंस (Medical Science) में ढाई से तीन किलो के बच्चे को नार्मल कैटेगरी में रखा जाता है जबकि ढाई किलो से कम वजन के बच्चे को लो बर्थ वेट की कैटेगरी में रखा जाता है. पर अगर बच्चों का वजन एक किलो से कम हो तो इसे मेडिकल भाषा में एक्सट्रीमली लो वेट कैटेगरी में रखा जाता है. मेडिकल साइंस में विश्वास रखने वाले डॉक्टर और दूसरे लोग ऐसे बच्चों की जिंदगी को निराशा की भाव से देखते है. बेगूसराय के एक डॉक्टर अरबिंद कुमार ने ऐसे बच्चो को नई जिंदगी देकर ना सिर्फ एक मिसाल कायम की है, बल्कि कम बेट के बच्चे को बचाने के मिथक को भी तोड़ा है.

जटिल मामला देख डॉक्टरों के भी फूलने लगे थे हाथ-पांव

इस संबंध मे डॉक्टर अरबिंद कुमार का कहना है कि एक्सट्रीमली लो वेट के बच्चे बिहार ही नहीं देश मे सिर्फ 10 प्रतिशत ही बच पाते है. ऐसे मे दोनों बच्चे को नई जिंदगी देकर उन्हें काफी अच्छा महसूस हो रहा है. उन्होंने बताया कि जब ऐसा केस उनके पास आया तो उनके भी हाथ-पैर फूलने लगे. पर उन्होंने इसे चैलेंज के रूप में लेते हुए अपनी कोशिश जारी रखें जिसका परिणाम है कि आज दोनों बच्चे स्वस्थ हैं और अपनी मां का दूध पी रहे हैं. डॉक्टर ने बताया कि कोशिश करने वालों के साथ भगवान भी होते हैं और यही सोचकर उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी जिसके बाद उन्हें सफलता हाथ लगी. डॉक्टर ने बताया कि एक मिथ है कि 500 से कम ग्राम के बच्चे जिंदा नहीं रह पाते हैं. लेकिन, ट्विन बेबी को बचाकर वह वैसे लोगों को यह संदेश देना चाहते है कि अगर कम बजन के बच्चे पैदा हो तो चिंता की कोई बात नहीं उनकी जिंदगी बचाई जा सकती है.

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IVF तकनीक से हुआ जुड़वा बच्चे का जन्म

बता दें, नवकोठी थाना क्षेत्र के बगरस गांव के रहने वाले एक दंपत्ति पिछले 20 सालों से बच्चे के लिए तरस रहे थे. इसी बीच एक महिला डॉक्टर की देख रेख में आईवीएफ़ (IVF) विधि से इस दंपत्ति ने बच्चे को जन्म देने को सोचा. फिर इस विधि को अपनाने के दौरान 6 महीने में ही बच्चे को जन्म देने की नौबत आ गई. जिसके बाद जुड़वा बच्चों एक लड़का और दूसरी लड़की ने जन्म लिया. लड़की की वजह जहां 800 ग्राम के करीब है, वहीं  वही लड़के का बजन लगभग 500 ग्राम था. दोनों ही बच्चे को जन्म लेने के साथ स्वास्थ्य लेने की समस्या शुरू हो गई. बच्चे के क्रिटिकल हालत को देखकर एक महिला चिकित्सक ने डॉ अरविंद कुमार को अपने यहां बुलाया और बच्चे की जिंदगी बचाने की बात कही. बच्चे के इस हालत को देखकर ना सिर्फ मां पिता निराश हो गए बल्कि खुद डॉक्टर अरविंद कुमार भी निराश हो गए पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी जिद को आगे करते हुए ईश्वर के सहारे बच्चे को जिंदगी बचाने में जुट गए.

20 सालों से बच्चे के लिए परेशान थे दंपत्ति

इस संबंध मे डॉक्टर ने बताया की अगर डॉक्टर में जिद हो तो चमत्कार होते ही रहते हैं. वहीं उन्होंने कहा कि कोशिश करने वालों के साथ भगवान भी खड़े होते हैं. जिसके कारण वह इस सफलता को पाने मे कामयाब हो सके. वही इस संबंध में प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉक्टर स्वाती कुमारी ने बताया कि 20 साल से एक दंपत्ति बच्चे के लिए परेशान थे. जिसके बाद दोनों दंपत्ति ने आई बीएफ विधि से बच्चे को जन्म देने का फैसला लिया. डॉ स्वाति ने बताया कि यह एक जटिल प्रक्रिया है जहां भ्रूण बाहर होता है और 5 दिन के बाद उसे जन्म देने वाली मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है. जिसे बोलचाल की भाषा में टेस्ट ट्यूब बेबी भी कहा जाता है. उन्होंने बताया की ऐसी जटिल परिस्थिति में जन्म लेने वाले बच्चों के लिए एक बेहतर बाल चिकित्सक का होना बेहद आवश्यक होता है, जैसा इस मामले मे देखने को मिला.

टैग: Begusarai news, बिहार के समाचार, आईवीएफ

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