Home Politics शहरी निकाय चुनाव में OBC की जीत का आंकड़ा बनेगा कोटे की रिपोर्ट का आधार, आयोग ने मांगी पिछले 28 साल की रिपोर्ट

शहरी निकाय चुनाव में OBC की जीत का आंकड़ा बनेगा कोटे की रिपोर्ट का आधार, आयोग ने मांगी पिछले 28 साल की रिपोर्ट

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शहरी निकाय चुनाव में OBC की जीत का आंकड़ा बनेगा कोटे की रिपोर्ट का आधार, आयोग ने मांगी पिछले 28 साल की रिपोर्ट

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रोहित मिश्र, लखनऊ: साल 1995 के बाद से सामान्य सीटों पर ओबीसी प्रतिनिधित्व के आंकड़े ही शहरी निकायों के चुनाव में ओबीसी आरक्षण का आधार बनेंगे। चुनाव के पहले ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत तय करने के लिए बने समर्पित ओबीसी आयोग ने सभी शहरी निकायों से इसके आंकड़े तलब किए हैं। इन आंकड़ों के आकलन के बाद तैयार रिपोर्ट से ही ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत तय किया जाएगा। सभी शहरी निकायों में अलग-अलग प्रतिशत में ओबीसी आरक्षण दिया जा सकता है।

शहरी निकायों में ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत तय करने के लिए हाई कोर्ट ने पिछड़ी जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आंकलन करने का आदेश दिया था। यह आकलन एक स्वतंत्र आयोग द्वारा किया जाना था। कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने समर्पित आयोग का गठन किया है। हाल ही में इस समर्पित आयोग की तरफ से सभी जिला अधिकारियों को पत्र लिखा गया है। इसमें उन्हें आदेश दिया गया है कि एक तय फॉर्मेट में साल 1995 के बाद से हुए शहरी निकायों के चुनावों में सामान्य सीटों पर जीते ओबीसी प्रत्याशियों के बारे में जानकारी दी जाए।

यह जानकारी वॉर्ड में जीते सभासदों या पार्षदों के अलावा नगर निगमों में मेयर और नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में अध्यक्ष पदों के लिए भी देनी होगी। जिला अधिकारियों से मांगे गए इस ब्योरे को शहरी निकाय जुटा रहे हैं। जल्द इसके संबंध में रिपोर्ट आयोग को सौंपे जाने दावा किया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि आयोग मार्च तक इस रिपोर्ट को फाइनल करके ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत तय करने की सिफारिश करने की तैयारी कर रहा है।

रिपोर्ट तैयार करने में निकायों का छूट रहा पसीना
साल 1995 के बाद से हुए शहरी निकायों के चुनाव की रिपोर्ट तैयार करने में शहरी निकायों को पसीने छूट रहे हैं। दरअसल, कई ऐसे शहरी निकाय हैं, जिन्होंने इस तरह के अभिलेख सुरक्षित नहीं रखे हैं, जिनमें जीते हुए प्रतिनिधियों के जाति संबंधी आंकड़े हों। इसकी वजह यह है कि शहरी निकायों के चुनाव में ओबीसी प्रत्याशियों की सीट अलग से आरक्षित होती है।

ऐसे में अनारक्षित सीटों पर जीतने वाला उम्मीदवार किस जाति का है, यह जानकारी निकायों के लिए अनुपयोगी होती थी। ऐसे में ब्योरे के न होने से निकायों की दिक्कतें बढ़ रही हैं। कई शहरी निकाय राज्य निर्वाचन आयोग से रिपोर्ट निकालकर समस्या का समाधान तलाशने और रिपोर्ट बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

…तो घटेगा आरक्षण प्रतिशत!
शहरी निकायों में ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने साफ कहा था कि यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आरक्षण है। यह नौकरी और शिक्षा से अलग है। राजनीतिक भागीदारी का आकलन किया जाना चाहिए। अनारक्षित सीटों पर ओबीसी प्रत्याशियों की जीत से इसी का आकलन किए जाने का प्रयास हो रहा है।

सूत्र बताते हैं कि जिन शहरी निकायों में अनारक्षित सीटों पर जीते ओबीसी उम्मीदवारों की संख्या में इजाफा होगा, वहां आरक्षण का प्रतिशत 27 से कम रह सकता है। वजह है कि अनारक्षित सीटों पर ओबीसी प्रत्याशियों की जीत से उन शहरी निकायों में उनकी राजनीतिक स्थिति के सशक्त होने का आकलन हो सकता है।

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